भोजपुरिया माटी के एगो लाल चितेरा रहलन - राम लखन विद्यार्थी-----------------------------------------------------------------------
आकास में एगो ना हजारो हजार तरेगन लउकेलन जेकरा के गिनल आसान नईखे। सब के सब टिमटिमालन कुछ थोड़े कुछ ज्यादा। ओही आकास नछतरन के बीच एगो तरेगन अइसनो होला जेकर टीमटीमाइल सभे के अपना ओर खींचेला लासा अइसन। उ तारक के कहानी इतिहासो के गोदना में गोदाइल मिली। नर नारायण सभे ओकरा के ध्रुव तारा के नांव से जाने ला।
ध्रुव तारा आकासे के सोभा ना बाड़े । समूचा तारामंडल के सोभा बाड़े । ओही तरह से भोजपुरिया माटी में रचल बसल निक जबुन रोहतास के धरती प जामल एगो ध्रुवतारा भइले जेकर नांव लेत हमार छाती पुआ अस फुल जाला ,खिल जाला। उ भोजपुरी साहित्य के मूर्धन्य कवि, कथाकार, नाटककार आ उपन्यासकार हवे राम लखन 'विद्यार्थी'। इनकर नांवें विद्यार्थी ना ह, ई सच में आपन समूचा जिनिगी एक विद्यार्थी बन के गुजरलन
हम इनका के जानत बानी, बोलले बतिअइले बानी । हमरा खातिर ई सौभाग्य के बात बा। आउ ईहे भोजपुरी साहित्य से मिलल हमरा के परसाद भी । बोले के त दिन भर हिनका से हुनका से हमनी के भोजपुरिये बोली ला जा। मगर तबो भोजपुरी इनका जस ना बोले आईल । हमनी के बोली में हिंदी अउर अंगरेजी, मगही आउर ना जाने अइसन केतना खिचड़ी जस भाषा ,बोली मिल जाला बोलत खानी । पर, ई मानुस जिनिगी भर बिल्कुल विशुद्ध भोजपुरी बोले-लिखे में महारत पइले रहन । ई हम ना इनकर लिखल भोजपुरी साहित्य में उठाकर कवनो किताब पढ़ लिहीं समझ में आ जाइ । 'इयाद रह जाला' इनकर उपन्यास बा । अगर कोई कहे कि हम भोजपुरिया बोली के हईं त ओकरा के ई उपन्यास जरूर पढ़े के चाहीं । ई उपन्यास ना ह भोजपुरी के पाठशाला ह । विद्यार्थी जी ई उपन्यास में भारतीय समाज के नायक-नायिका मधुकर, बिंदु, गिरधर दास आ ओकर विधवा पत्नी सिलोचन वृद्ध नारायण दास, खल पात्र कालीचरण, मनमोहन, मनु महाराज, ज्ञानदेव सुकालू जइसन पात्र गढ़ के समाज में फैलल बड़का छोटका जात के बीच के खाई रेखांकित करके असली चेहरा के सबके सामने बड़ा ही सजीव रूप में रखे के कोसिस नइखन कइले, सांच कहीं त रखले बाड़न।
इनकर जनम आजादी के पहिले के बा । ई भीमराव अंबेडकर से लेकर ओमप्रकाश वाल्मीकि, जय प्रकाश कर्दम, बिहारी लाल हरित, सूरजपाल चौहान के सामाजिक जिनिगी के अध्ययन ही ना कइले बाडन । बल्कि आपन जिनिगी ओही तरे जियले बाडन; दुख में विसाद में । बड़कन जातियन से 'अरे' के संबोधन सुनके इनकर मन के पीर साफ ई उपन्यास में लउक जाला बिना हरे बहेरा के । सुकालू कवनो दूसर ना हवे । ई अपने के सुकालू में उतरले बाड़न । सुकालू ही विद्यार्थी बाडन ,विद्यार्थी ही सुकालू बाड़न ।
हर समय पतझड़े ना रहे। तरुई पर नया-नया फूलो-पत्ती आवेला। आवेला त मन के बसंत अपने आप झूम उठेला । केहू के आपन निश्छल मन से मित बना लेवे ला । विद्यार्थी लड़कंइया में त जरूरे कवनो लइकी से दिल लगा ले ले होइहें । प्रेम के जवना रूप में प्रस्तुत कइले बाड़न एह प्रस्तुति में उनकर लड़कइयां के प्यार साफ झलकता। इतना शुद्ध निश्छल प्रेम मधुकर और बिंदु के रूप में विद्यार्थी जी के कहानी में ही हो सकेला ।
विद्यार्थी के जिनिगी में एतना कहानी बा कि कवन कहानी कहल जाव आ कवना के छोड़ल जाव, तय कइल बड़ा कठिन बा । इनकर समूचा जिनिगी पानी के मच्छरिए लेखा तड़पत आ पियासल बीतल । अइसन ना कि ई बेरोजगार रहलन । जवानिये से सरकारी नौकरी कइलन । सरकार से तनखाह पइलन, पेंसन उठइलन, फिर भी इनका जिंनिगी के हिस्सा में सुख बहुत थोड़ आइल । जेतना सुख आइल ओतने में जिंदगी जियलन । शिकायत करतन त आखिर केकरा से । भगवान उनका आंगन में एगो सुंदर बिरिछ लगवलन । ओह बिरिछ के खाद पानी देत इनका आसरा हो गइल कि बिरिछ जब बड़हन होई त हमरा के आपन शीतल छांह दिही । समय के साथ आंगन के बिरिछ बड़ त भइल बाकिर उनका के कभी छांह ना देलस । अउर ना उनका कबो लगन जागल ओह बिरिछ के छांव में थोड़ देर सुस्ताये के । बल्कि भर जिनिगी इहे ओह बिरिछ के छांव में रखलन । जिनिगी भर साथ निभावे वाली जीवनसंगिनी (स्व. गुंजराइती देवी) उनका के अधेड़ उमिर में छोड़ के पराइल पंछी हो गईली । जिनिगी भर उ अपन भीतर -बाहर अपन काव्यन के रूख धर के उनका के कवन डगर,कवन मेला,कवन जहान ना खोजले । अगर इनका जिनिगी पर बात कइल जाव त एगो मोटहन किताब जरूर लिखा जाई । काहे कि इनकर जिनिगी के राह एतना उच्च-खाल से भरल बा कि कवनो राही मोच खा के गिर पड़ी । शायद एही से आपन जिनिगी के अंतिम छन में 'परिंदा खोजे बसेरा' भोजपुरी अतुकान्त कविता संग्रह लिख के आपन हतास जिनिगी के थोड़ संतवना देले बाड़े । एह कविता संग्रह के एक-एक अतुकान्त कविता विद्यार्थी जी के क्लांत जिनिगी के कहानी पेयाज के परत दर परत चीख-चीख के सुना रहल बिया-
'सांझि - बिहाने
बिहाने - सांझि
हम निहारत रहिला
आपन उमिर के धूप
पियराइल, पियराइल ...।'
उमिर के आखिर में केतना पियरा गइल होइहें, ई त उहे बता सकेलन । उनकर कुंठा उनकर लिखल उहे ना समझी जे एकदमे से कठजीव होई । उनकर आपन अंगना के लगावल बिरिछ कबो उनका मुताबिक एको पहर के मुलायम धूप आ छांह ना देलस । कविता के माध्यम से पाठक के बतावे के कोसिस कइले बाड़न । बड़ा ही पढ़ के मन रुआसल हो जाला -
'जेह दिन हमार
अर्थी
चलल होई मरघट
ओह दिन कवनो
रहमी के
हमारा बदे
दू गज कफन
जरूर मिलल होई ।
आपन त बेगाना
बनि के
बेलाग रहलन...
फिरू आपन दुस्मन के
बात के का कहीं...
हम, कइसे कहीं कि
हमार अरथी में
केकर-केकर कान्हा
लागल होई ।'
विद्यार्थी जी मोह माया के बंधन छोड़ के सदा के लिए मृत्यु लोक से चल गइलन । आपन समूचा जिनिगी लोक वासना से अछूता रखलन । ई आज के जुग में बड़ बात बा । करमठ के मूर्ति, साहित्य शिल्पी कला के इतिहास में जे अमरत्व पा गइल उ कबो ना मर सकेला । विद्यार्थी जी एगो देह के नांव ना ह बल्कि भोजपुरी साहित्य के हस्ताक्षर के रूप में अंकित एगो चितेरा के नांव ह । उनका पास पढ़ाई के कवनो बड़ डीग्री ना रहे। उ आपन जिनिगी के पढ़ाई दुख, सोच आ चिंतन के स्लेट पर पढ़ल रहन । आपन जिनिगी के आखिरी कृति 'परिंदा खोजे बसेरा' में आपन स्लेट पर लिखले बाड़न कि -
'हम का पढ़ली
का लिखली
अबही ले हम
कुछ ना जनली
जिनिगी ओरा गईल
बस -
सोचे में
गुथे में
चिंतन में !
उमिर के तटबंध पर
बइठि के
जिनिगी के धूप-छांव के
छंदन में पिरो के
काव्य के काया में
सजा के
झांकि लिहिला आपन
अनुभूति के
नव-निरमित विभूति के
जागरण में ।'
का जाने ई काव्य संग्रह इनकर आखिरी रचना बा या अउरी कवनो रचना के पाण्डुलिपी केहू के अलमारी या दिरखन पर रखल प्रकाशक के मुंह ताकत होई । ई त हम ना बता सकिला । इतना जरूर कह सकिला कि भगवान कुछ अगरम जरूर दे जालन अपना साथ ले जाए वाला आदमी के । विद्यार्थी के भी भगवान अगरम देले होइहें । तबे 'परिंदा खोजे बसेरा ' भोजपुरी अतुकान्त काव्य संग्रह नांव से एगो काव्य के रचना कइलन । एह में जितना कविता बा पढ़ के लागत बा कि भगवान उनका ले जाए से पहले ही रचना खुद उनका लिखवइले होखस उनके हाथे । मरला के बाद उनका देह के साथ का होई अउर का उनका साथ कइल जाई सब अनुमान उनका लग गईल रहे । कहल जाला कि साहित्यकार अपने बदे ना समाज बदे लिखेला । बस समाज के आईना में खुद के खड़ा करके लिखेला। इहे बात सांच बा। अगर ई बात सांच ना होइत त सीडी बाबू, प्रधान संपादक, त्रिवेणी प्रकाशन, डेहरी ऑन-सोन, रोहतास, बिहार के हम नांव ना लेती । सीडी बाबू से विद्यार्थी जी के मुलाकात एगो साहित्यिक आयोजन में भइल रहे । उनकर व्यक्तित्व आ इनका देह से निकलल आभा सीडी बाबू के मन के मोह लेलस । तबे से सीडी बाबू और उनकर मेल-जोल धीरे-धीरे समय के साथ गुड़ के रावा लेखा मीठा हो गइल । विद्यार्थी जी से पहिल-पहिल हमार मुलाकात सीडी बाबू के घर पर ही भइल रहे । ओहिजे से हमार इनकर मिलल-जुलल होखल शुरू भइल । हमरा घरे आवे जाए लगलन आ हम इनका घरे जाए लगनी । बहुत कुछ सीखे जाने के मिलल, साहित्य में हमारा इनका से । सीडी बाबू के इनका से कैसे मुलाकात भइल एकर जिकिर खुद सीडी बाबू इनकर उपन्यास 'इयाद रह जाला' के भूमिका में लिखले बाड़न ।
कहाउत बा कि हीरा के परख एगो जौहरी ही कर सकेला । ओसहीं साहित्यकार के पता होखेला कि हाथ के लिखल रचना जब तक प्रकाशित होकर समाज (पाठक) के बीच ना आई तब ले रचना के भीतर छपल संदेश (मन के अनुगूंज) लोगन तक कइसे पहुंची । विद्यार्थी जी खूब बढ़िया से एह बात के समझत रहन । थथमल, कांपत गोड़ आ कम लउकत आंख से चलत खानि कभी सुस्तास कभी हांफे लागस । एह हालत में भी आपन रचल संसार के समाज में लावे खातिर सीडी सिंह (प्रकाशक) के घर जा के 'परिंदा खोजे बसेरा' के पांडुलिपि दे के चल अईले । ई सोच के कि कबो त प्रकाशक महोदय के एह पर नजर पर जाई अउर हमार जिनिगी के अंतिम आखर के एगो किताब के सकल दे के अउर समाज के बीच ला के हमरा पर उपकार करिहें। ई बात भले अपना मुंह से सीधे ना कहले होंइहें लेकिन दुखी आ पीड़ित उनकर मन जरूर कहले होई ।
सीडी सिंह उनका मरला के कुछ ही साल बाद विद्यार्थी जी के आत्मा के बात सुन लिहले अउर वोही दिन तय कर लेले की विद्यार्थी जी के जिनिगी के आखरी आखर संग्रह 'परिंदा खोजे बसेरा' भोजपुरी अतुकांत काव्य संग्रह उनकर इयाद में श्रद्धांजलि स्वरुप उनका के समर्पित करे के बा । अउर एह दिशा में सीडी सिंह आपन गोड़ बढ़ा देले बाडन ।
अभिषेक कुमार अभ्यागत
न्यू एरिया, काली मंदिर गली,
डेहरी ऑन सोन, रोहतास, बिहार।