हिन्दी साहित्यिक मंच
भाषा चेतना की सहज अभिव्यक्ति है, जिसे साहित्य द्वारा समझा ही नहीं जा सकता है; बल्कि भाषा-साहित्य द्वारा समाज को एक उन्नयन दिशा की ओर प्रशस्त भी किया जा सकता है ।
Friday, April 17, 2026
Friday, February 06, 2026
प्रो. राम अशीष की दो पुस्तकों ' कुछ अनुत्तरित प्रश्न' तथा ' किसी और को दोष क्यों दूँ' का लोकार्पण
डेहरी ऑन सोन । । 'साहित्य संगम' तथा 'पहचान' पत्रिका के तत्वाधान में शहर के सुभाष नगर में प्रो. राम अशीष की दो पुस्तकों ' कुछ अनुत्तरित प्रश्न' तथा ' किसी और को दोष क्यों दूँ' का लोकार्पण हुआ। जिसकी अध्यक्षता सीडी सिंह ने किया । मुख्य अतिथि के तौर पर शहर के मशहूर चिकित्सक व समाजसेवी डॉ. निर्मल सिंह ने की । इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्रो.राम अशीष सिंह ने समाज और व्यवस्था की सच्चाई को गहरे में देखा है और उसे बारीकी से लेखबद्ध किया है । कथाकार सीडी सिंह ने कहा कि राम अशीष सिंह की समझ बहुत स्पष्ट है । उनके प्रश्न अनुत्तरित कर देने वाले हैं । डॉ. हरेराम सिंह ने कहा कि राम अशीष सिंह की कविता ओबीसी कविता की अच्छी कविताओं में से हैं, जिनमें प्रतिरोध जगह- जगह मौजूद है। अभिषेक कुमार अभ्यागत ने कहा कि राम अशीष सिंह एक अच्छे कवि हैं, उनकी स्त्री पर लिखी कविताएँ नए ढंग की हैं। लोकार्पण व पुस्तक- चर्चा के बाद इस एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें शहर के कई कवियों ने अपनी- अपनी कविताएँ प्रस्तुत की। जिनमें डॉ. रामनाथ सिंह ने 'फिर भी हम जिंदा हैं', हरेराम सिंह ने ' नपुंसक राजधानी', अभिषेक कुमार अभ्यागत ने ' केंद्र में आने की लड़ाई', ' एक स्त्री का स्पर्श' , निरंजन कुमार ' निर्भय ' ने 'ओ नेल्सन मंडेला', राम अशीष सिंह' ने 'मदर इंडिया', 'सत्य', 'भस्मासुर की जननी', शंभू कुमार सिंह ने 'दहेज की आग' मुख्य रहीं । संगीत शिक्षक राजेश जी ने सूरदास की 'अँखिया हरिदर्शन को प्यासी' का गायन किया। स्नेह भारती, सुगम कुमारी, आयुषी, विभा भारती, मुकुल, कार्तिक तथा परी कुमारी ने भी अपनी- अपनी कविताओं का पाठ किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. कुमार राजेश्वर ने किया।
Sunday, August 10, 2025
दोस्ती/ Dosti यह कविता हमेशा हमे दोस्तों की याद दिलाएगी
देखते ही देखते,
हवाओं सा उड गय,
कभी जो हमने साथ;
बिताए थे, दोस्तों के संग ।
वो मस्ती,
वो रंग,
वो उमंग,
आज वह हवाएं
मौन दिशा से उड़ कर,
उन दोस्तों की छवि गंध लिए;
मेरे चित्त को महकाने आयी है,
उनकी यादों की बरसात लिए,
उमड़ी है, मेरे अंतर्मन को भिगोने
और, मैं भीगकर मानों
अपनी दोस्ती का हाथ थामें,
अपने दोस्तों के साथ चलरहा हूँ ।
- अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'
हवाओं सा उड गय,
कभी जो हमने साथ;
बिताए थे, दोस्तों के संग ।
वो मस्ती,
वो रंग,
वो उमंग,
आज वह हवाएं
मौन दिशा से उड़ कर,
उन दोस्तों की छवि गंध लिए;
मेरे चित्त को महकाने आयी है,
उनकी यादों की बरसात लिए,
उमड़ी है, मेरे अंतर्मन को भिगोने
और, मैं भीगकर मानों
अपनी दोस्ती का हाथ थामें,
अपने दोस्तों के साथ चलरहा हूँ ।
- अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'
डेहरी आन सोन, रोहतास, (बिहार)
'परिंदा खोजे बसेरा' भोजपुरी अतुकान्त कविता संग्रह का पुस्तक सम्मति : अभिषेक कुमार अभ्यागत
भोजपुरिया माटी के एगो लाल चितेरा रहलन - राम लखन विद्यार्थी
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आकास में एगो ना हजारो हजार तरेगन लउकेलन जेकरा के गिनल आसान नईखे। सब के सब टिमटिमालन कुछ थोड़े कुछ ज्यादा। ओही आकास नछतरन के बीच एगो तरेगन अइसनो होला जेकर टीमटीमाइल सभे के अपना ओर खींचेला लासा अइसन। उ तारक के कहानी इतिहासो के गोदना में गोदाइल मिली। नर नारायण सभे ओकरा के ध्रुव तारा के नांव से जाने ला।
ध्रुव तारा आकासे के सोभा ना बाड़े । समूचा तारामंडल के सोभा बाड़े । ओही तरह से भोजपुरिया माटी में रचल बसल निक जबुन रोहतास के धरती प जामल एगो ध्रुवतारा भइले जेकर नांव लेत हमार छाती पुआ अस फुल जाला ,खिल जाला। उ भोजपुरी साहित्य के मूर्धन्य कवि, कथाकार, नाटककार आ उपन्यासकार हवे राम लखन 'विद्यार्थी'। इनकर नांवें विद्यार्थी ना ह, ई सच में आपन समूचा जिनिगी एक विद्यार्थी बन के गुजरलन
हम इनका के जानत बानी, बोलले बतिअइले बानी । हमरा खातिर ई सौभाग्य के बात बा। आउ ईहे भोजपुरी साहित्य से मिलल हमरा के परसाद भी । बोले के त दिन भर हिनका से हुनका से हमनी के भोजपुरिये बोली ला जा। मगर तबो भोजपुरी इनका जस ना बोले आईल । हमनी के बोली में हिंदी अउर अंगरेजी, मगही आउर ना जाने अइसन केतना खिचड़ी जस भाषा ,बोली मिल जाला बोलत खानी । पर, ई मानुस जिनिगी भर बिल्कुल विशुद्ध भोजपुरी बोले-लिखे में महारत पइले रहन । ई हम ना इनकर लिखल भोजपुरी साहित्य में उठाकर कवनो किताब पढ़ लिहीं समझ में आ जाइ । 'इयाद रह जाला' इनकर उपन्यास बा । अगर कोई कहे कि हम भोजपुरिया बोली के हईं त ओकरा के ई उपन्यास जरूर पढ़े के चाहीं । ई उपन्यास ना ह भोजपुरी के पाठशाला ह । विद्यार्थी जी ई उपन्यास में भारतीय समाज के नायक-नायिका मधुकर, बिंदु, गिरधर दास आ ओकर विधवा पत्नी सिलोचन वृद्ध नारायण दास, खल पात्र कालीचरण, मनमोहन, मनु महाराज, ज्ञानदेव सुकालू जइसन पात्र गढ़ के समाज में फैलल बड़का छोटका जात के बीच के खाई रेखांकित करके असली चेहरा के सबके सामने बड़ा ही सजीव रूप में रखे के कोसिस नइखन कइले, सांच कहीं त रखले बाड़न।
इनकर जनम आजादी के पहिले के बा । ई भीमराव अंबेडकर से लेकर ओमप्रकाश वाल्मीकि, जय प्रकाश कर्दम, बिहारी लाल हरित, सूरजपाल चौहान के सामाजिक जिनिगी के अध्ययन ही ना कइले बाडन । बल्कि आपन जिनिगी ओही तरे जियले बाडन; दुख में विसाद में । बड़कन जातियन से 'अरे' के संबोधन सुनके इनकर मन के पीर साफ ई उपन्यास में लउक जाला बिना हरे बहेरा के । सुकालू कवनो दूसर ना हवे । ई अपने के सुकालू में उतरले बाड़न । सुकालू ही विद्यार्थी बाडन ,विद्यार्थी ही सुकालू बाड़न ।
हर समय पतझड़े ना रहे। तरुई पर नया-नया फूलो-पत्ती आवेला। आवेला त मन के बसंत अपने आप झूम उठेला । केहू के आपन निश्छल मन से मित बना लेवे ला । विद्यार्थी लड़कंइया में त जरूरे कवनो लइकी से दिल लगा ले ले होइहें । प्रेम के जवना रूप में प्रस्तुत कइले बाड़न एह प्रस्तुति में उनकर लड़कइयां के प्यार साफ झलकता। इतना शुद्ध निश्छल प्रेम मधुकर और बिंदु के रूप में विद्यार्थी जी के कहानी में ही हो सकेला ।
विद्यार्थी के जिनिगी में एतना कहानी बा कि कवन कहानी कहल जाव आ कवना के छोड़ल जाव, तय कइल बड़ा कठिन बा । इनकर समूचा जिनिगी पानी के मच्छरिए लेखा तड़पत आ पियासल बीतल । अइसन ना कि ई बेरोजगार रहलन । जवानिये से सरकारी नौकरी कइलन । सरकार से तनखाह पइलन, पेंसन उठइलन, फिर भी इनका जिंनिगी के हिस्सा में सुख बहुत थोड़ आइल । जेतना सुख आइल ओतने में जिंदगी जियलन । शिकायत करतन त आखिर केकरा से । भगवान उनका आंगन में एगो सुंदर बिरिछ लगवलन । ओह बिरिछ के खाद पानी देत इनका आसरा हो गइल कि बिरिछ जब बड़हन होई त हमरा के आपन शीतल छांह दिही । समय के साथ आंगन के बिरिछ बड़ त भइल बाकिर उनका के कभी छांह ना देलस । अउर ना उनका कबो लगन जागल ओह बिरिछ के छांव में थोड़ देर सुस्ताये के । बल्कि भर जिनिगी इहे ओह बिरिछ के छांव में रखलन । जिनिगी भर साथ निभावे वाली जीवनसंगिनी (स्व. गुंजराइती देवी) उनका के अधेड़ उमिर में छोड़ के पराइल पंछी हो गईली । जिनिगी भर उ अपन भीतर -बाहर अपन काव्यन के रूख धर के उनका के कवन डगर,कवन मेला,कवन जहान ना खोजले । अगर इनका जिनिगी पर बात कइल जाव त एगो मोटहन किताब जरूर लिखा जाई । काहे कि इनकर जिनिगी के राह एतना उच्च-खाल से भरल बा कि कवनो राही मोच खा के गिर पड़ी । शायद एही से आपन जिनिगी के अंतिम छन में 'परिंदा खोजे बसेरा' भोजपुरी अतुकान्त कविता संग्रह लिख के आपन हतास जिनिगी के थोड़ संतवना देले बाड़े । एह कविता संग्रह के एक-एक अतुकान्त कविता विद्यार्थी जी के क्लांत जिनिगी के कहानी पेयाज के परत दर परत चीख-चीख के सुना रहल बिया-
'सांझि - बिहाने
बिहाने - सांझि
हम निहारत रहिला
आपन उमिर के धूप
पियराइल, पियराइल ...।'
उमिर के आखिर में केतना पियरा गइल होइहें, ई त उहे बता सकेलन । उनकर कुंठा उनकर लिखल उहे ना समझी जे एकदमे से कठजीव होई । उनकर आपन अंगना के लगावल बिरिछ कबो उनका मुताबिक एको पहर के मुलायम धूप आ छांह ना देलस । कविता के माध्यम से पाठक के बतावे के कोसिस कइले बाड़न । बड़ा ही पढ़ के मन रुआसल हो जाला -
'जेह दिन हमार
अर्थी
चलल होई मरघट
ओह दिन कवनो
रहमी के
हमारा बदे
दू गज कफन
जरूर मिलल होई ।
आपन त बेगाना
बनि के
बेलाग रहलन...
फिरू आपन दुस्मन के
बात के का कहीं...
हम, कइसे कहीं कि
हमार अरथी में
केकर-केकर कान्हा
लागल होई ।'
विद्यार्थी जी मोह माया के बंधन छोड़ के सदा के लिए मृत्यु लोक से चल गइलन । आपन समूचा जिनिगी लोक वासना से अछूता रखलन । ई आज के जुग में बड़ बात बा । करमठ के मूर्ति, साहित्य शिल्पी कला के इतिहास में जे अमरत्व पा गइल उ कबो ना मर सकेला । विद्यार्थी जी एगो देह के नांव ना ह बल्कि भोजपुरी साहित्य के हस्ताक्षर के रूप में अंकित एगो चितेरा के नांव ह । उनका पास पढ़ाई के कवनो बड़ डीग्री ना रहे। उ आपन जिनिगी के पढ़ाई दुख, सोच आ चिंतन के स्लेट पर पढ़ल रहन । आपन जिनिगी के आखिरी कृति 'परिंदा खोजे बसेरा' में आपन स्लेट पर लिखले बाड़न कि -
'हम का पढ़ली
का लिखली
अबही ले हम
कुछ ना जनली
जिनिगी ओरा गईल
बस -
सोचे में
गुथे में
चिंतन में !
उमिर के तटबंध पर
बइठि के
जिनिगी के धूप-छांव के
छंदन में पिरो के
काव्य के काया में
सजा के
झांकि लिहिला आपन
अनुभूति के
नव-निरमित विभूति के
जागरण में ।'
का जाने ई काव्य संग्रह इनकर आखिरी रचना बा या अउरी कवनो रचना के पाण्डुलिपी केहू के अलमारी या दिरखन पर रखल प्रकाशक के मुंह ताकत होई । ई त हम ना बता सकिला । इतना जरूर कह सकिला कि भगवान कुछ अगरम जरूर दे जालन अपना साथ ले जाए वाला आदमी के । विद्यार्थी के भी भगवान अगरम देले होइहें । तबे 'परिंदा खोजे बसेरा ' भोजपुरी अतुकान्त काव्य संग्रह नांव से एगो काव्य के रचना कइलन । एह में जितना कविता बा पढ़ के लागत बा कि भगवान उनका ले जाए से पहले ही रचना खुद उनका लिखवइले होखस उनके हाथे । मरला के बाद उनका देह के साथ का होई अउर का उनका साथ कइल जाई सब अनुमान उनका लग गईल रहे । कहल जाला कि साहित्यकार अपने बदे ना समाज बदे लिखेला । बस समाज के आईना में खुद के खड़ा करके लिखेला। इहे बात सांच बा। अगर ई बात सांच ना होइत त सीडी बाबू, प्रधान संपादक, त्रिवेणी प्रकाशन, डेहरी ऑन-सोन, रोहतास, बिहार के हम नांव ना लेती । सीडी बाबू से विद्यार्थी जी के मुलाकात एगो साहित्यिक आयोजन में भइल रहे । उनकर व्यक्तित्व आ इनका देह से निकलल आभा सीडी बाबू के मन के मोह लेलस । तबे से सीडी बाबू और उनकर मेल-जोल धीरे-धीरे समय के साथ गुड़ के रावा लेखा मीठा हो गइल । विद्यार्थी जी से पहिल-पहिल हमार मुलाकात सीडी बाबू के घर पर ही भइल रहे । ओहिजे से हमार इनकर मिलल-जुलल होखल शुरू भइल । हमरा घरे आवे जाए लगलन आ हम इनका घरे जाए लगनी । बहुत कुछ सीखे जाने के मिलल, साहित्य में हमारा इनका से । सीडी बाबू के इनका से कैसे मुलाकात भइल एकर जिकिर खुद सीडी बाबू इनकर उपन्यास 'इयाद रह जाला' के भूमिका में लिखले बाड़न ।
कहाउत बा कि हीरा के परख एगो जौहरी ही कर सकेला । ओसहीं साहित्यकार के पता होखेला कि हाथ के लिखल रचना जब तक प्रकाशित होकर समाज (पाठक) के बीच ना आई तब ले रचना के भीतर छपल संदेश (मन के अनुगूंज) लोगन तक कइसे पहुंची । विद्यार्थी जी खूब बढ़िया से एह बात के समझत रहन । थथमल, कांपत गोड़ आ कम लउकत आंख से चलत खानि कभी सुस्तास कभी हांफे लागस । एह हालत में भी आपन रचल संसार के समाज में लावे खातिर सीडी सिंह (प्रकाशक) के घर जा के 'परिंदा खोजे बसेरा' के पांडुलिपि दे के चल अईले । ई सोच के कि कबो त प्रकाशक महोदय के एह पर नजर पर जाई अउर हमार जिनिगी के अंतिम आखर के एगो किताब के सकल दे के अउर समाज के बीच ला के हमरा पर उपकार करिहें। ई बात भले अपना मुंह से सीधे ना कहले होंइहें लेकिन दुखी आ पीड़ित उनकर मन जरूर कहले होई ।
सीडी सिंह उनका मरला के कुछ ही साल बाद विद्यार्थी जी के आत्मा के बात सुन लिहले अउर वोही दिन तय कर लेले की विद्यार्थी जी के जिनिगी के आखरी आखर संग्रह 'परिंदा खोजे बसेरा' भोजपुरी अतुकांत काव्य संग्रह उनकर इयाद में श्रद्धांजलि स्वरुप उनका के समर्पित करे के बा । अउर एह दिशा में सीडी सिंह आपन गोड़ बढ़ा देले बाडन ।
अभिषेक कुमार अभ्यागत
न्यू एरिया, काली मंदिर गली,
डेहरी ऑन सोन, रोहतास, बिहार।
Wednesday, October 06, 2021
प्रेम भरी पाती
नेहा रोज प्यार की पाती लिखती और कई-कई बार पढ़ती फिर कुछ जोड़ती, काटती फिर उस पाती को अपने हाथों में भींच कर दोनों हथेलियों के धर्षण से गेंद बनाकर खिड़की से बाहर बहते नाले में फेंक देती । पाती बहते बहते दूर निकल जाता । खिड़की से बहते पाती को देखकर वह मंद-मंद मुस्काती, कभी लज्जा से सिर झुका लेती । वह करीब छह माह से पाती लिख रही है । पर पाती पर अब तक वह अपने मन की बात न लिख पाई थी । उसकी सहेली रोमा उसके पाती वाली बात पर चिढ़ाती और रोमा उसे रोज नए-नए आइडिया भी देती । नेहा, रोमा की आइडिया ले रोज पाती लिखती । पाती की शुरुआत कभी वह डियर से करती कभी माई लव से करती । अंत में तुम्हारी प्रेम में नेहा रोशन लिखना न भूलती । नेहा का मूल नाम नेहा गुप्ता था । रोशन तो उसके पाती के नायक का सरनेम था । नेहा अभी से ही पाती के नायक का सरनेम लिखने लगी थी । नेहा के दिल में अपने प्रेमी के लिए प्यार तो इतना था कि एक सुन्दर ललित निबंध लिखा जाए । वह अपने पाती के नायक अनुभव रोशन से प्रेम तो अनन्त करती थी, पर प्रेम का इजहार अपने पाती के नायक की ओर से चाहती थी । यह भी आइडिया सहेली रोमा का ही था । नेहा तो चाहती थी कि, वह अनुभव से हाले दिल व्या कर दे पर रोमा नहीं चाहती थी कि प्यार का इजहार पहले नेहा के द्वारा हो । वह जनना चाहती थी कि अनुभव के दिल में नेहा के लिए कितना प्यार है । वह अनुभव के प्यार को परखना चाहती थी । यह प्रेम-आग दोनों तरफ से समान रूप से लगी थी । दुविधा यह थी कि अनुभव भी चाहता था कि हाले दिल पहले नेहा कहे । इनकी प्रेम कहानी लिखते वक्त एक कहानी मुझे याद आ गई कि लखनऊ के नवाबों की गाडी पहले आप, पहले आप में छुट गई थी । कहीं ऐसा न हो कि इनकी प्रेम कहानी भी लखनऊ के नवाबों की तरह पहले आप, पहले आप में मिलन बिन्दु तक पहुँचते-पहुँचते कोई दूसरी होनी ना हो जाए । जैसे फिल्मों में देखने को मिलता है । नेहा, रोमा, अनुभव तीनों कला स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के प्रथम वर्ष के छात्र-छात्रा थे । नेहा और अनुभव का प्रथम मिलन हिन्दी की व्याख्यान कक्षा में हीं हुई थी । इस प्रेम कहानी की शुरुआत यहीं से हुई थी । इस प्रेम कहानी की आधारशिला यहीं पर रखी गई थी । हिन्दी में एक रस श्रृंगार रस भी आता है । अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का हिन्दी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य 'प्रिय प्रवास' का व्याख्या प्रो. डॉ . हरेराम सिंह द्वारा इतना लालित्य पूर्ण होता था कि दोनों इसकी कमनीयता के सागर में डूब जाते । दोनों एक दूसरे के सौन्दर्य को निहारने लगते । कभी प्रेम के छंद लिखते । दोनों काॅलेज के गार्डन में बैठ घंटों प्रिय प्रवास महाकाव्य के बिंब-विधान, भाषा शिल्प आदि पर चर्चा करते । इस चर्चा के माध्यम से दोनों अपनी-अपनी भावनाएं भी रखते । प्रेम शब्द से परे भाव की परिणति है और भाव तो शब्द सीमा में आता ही नहीं है । उसकी तो सीमा रेखा असीमित है । पहला मिलन दूसरा विछोह । प्रेम में मिलन और विछोह एक पारावार की तरह है । प्रेम दोनों ही दशाओं में परात्पर है । क्योंकि, दोनों प्रेम का ही अलग-अलग नाम है । दोनों एक दूसरे की शुरुआत में अपने प्रेम को छुपाया प्रेम की अग्नि में भभक रहे थें । एक दिन बाजार में अनुभव रोमा से मिला । वह रोमा को तीर बनाकर अपने लक्ष्य को साधना चाहता था । रोमा से, नेहा के बारे में अपने हृदय में उमड़ते प्रेम को वह रोमा को बता देना चाहता था, ताकि रोमा उसके मन की बात नेहा से कह सके । अनुभव ने बड़े अनुनय-विनय किया । पर, रोमा संवदिया बनने को तैयार न हुई । उसने अनुभव से कह - "अपने और नेहा के प्रेम प्रसंग में मुझे बीच में ना लाव । तुम्हें प्यार है नेहा से तो तुम्हीं जा कर बताव । तुम्हारी सुविधा के लिए एक बात कहे देती हूँ । प्यार तो उसे भी है तुमसे, मगर शुरुआत वह तुम्ही से चाहती है ।"
रोमा की इस बात से वह रोमांचक से भर उठा । उसके रोम-रोम में अप्रत्याशित खुशी घुल गई । वह स्वयं को हवा में उड़ता हुआ महसूस कर रहा था । वह नेहा की मन की बात, उसकी सहेली रोमा से जानकर आनन्दित हो उठा था । उसके सारे संशय मिट गए । उसके और नेहा के बीच किन्तु, परन्तु जैसे शब्द का स्थान रिक्त हो गया । वह पूरे रास्ते कल्पनाओं में ही खोया रहा । उसका मन उससे अभी ही मिलकर दिल की सारी बात कह देना चाहता था । वह पूरी रात शब्दों को चुनता और सजाता रहा जैसे कोई योद्धा युद्ध में जाने से पहले अपने श्रेष्ठ वाण चुनता है । वह नेहा के प्रीत के रंग में डूबा प्रेम के पथ पर चला जा रहा था । उसके चारों तरफ आनन्द और उल्लास ही छाया था । क्षितिज से फूलों की वर्षा हो रही थी । चाँदनी रात उसे अपनी दुधिया रोशनी से नहला रही थी । तारें उसके बनाव, श्रृंगार में लगे थे । वह दूल्हे की भाँति दमक रहा था । यह ऐसा क्षण था जब मनुष्य अपना सर्वस्व अपने प्रेम पर लूटा देने को आतुर रहता है । यही जीवन का सच्चा आनंद है । प्रेम की शक्ति और प्रेम की भक्ति दोनों ही आदमी को नन्हा बालक बना देता है ।
हर निशा का अंत प्रात पर होता है । प्रात आशा की किरण लेकर आता है । जिसमें मनुष्य अपने अतीत से क्षिक्षा लेकर वत्तर्मान और भविष्य को सजाने का कार्य करता है । अनुभव आज समय से पहले ही काॅलेज के लिए घर निकल गया । उसका ध्यान तो केवल मंजिल पर था । रास्ता तो देख ही नहीं रहा था । काॅलेज के मुख्य द्वार पर वह खड़ा होकर नेहा की प्रतीक्षा करने लगा । कुछ देर इंतजार करने के उपरांत वह काॅलेज के गार्डन में जाकर बैठ गया । धीरे-धीरे लड़के-लड़कियों की भीड़ बढ़ने लगी । क्लास का समय भी हो गया था । सभी धीरे-धीरे क्लास में अपनी जगह पर बैठने लगे । वह भी बैठ गया, लेकिन क्लास में उसकी निगाहें सिर्फ नेहा गुप्ता को हीं खोज रही थी । वह कलम को बार-बार अपनी उँगलियों में नचाता फिर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी में समय देखता । इंतजार की घड़िया बड़ी लम्बी होती है इसका एक कारण यह भी है कि हमारी निगाहें बार-बार घड़ी को ही निहारती है । इंतजार की घड़ियाँ खत्म हुई। नेहा क्लास में इन कर गई । आज वह पीले सूट में आयी थी । सूट की कोर पर लाल लैस की बाॅडर थी । बाॅडर पर सुनहले रंग के सितारे टंके थे । बीच-बीच में लटकने भी टकी थी । जो चलने पर सितार की ध्वनि-सी झंकृत हो रही थी । बाल खुले हुए थे । उसके लंबे काले बाल, काले मेध की घटा-सी जान पड़ती थी । उसकी काली आँखें प्रेम की प्रतिमूर्ति बनी चमक रही थी । वह आकर अनुभव के आगे वाले बेंच पर बैठ गई, शशिकला के ठीक बगल में और अनुभव के ठीक पीछे । क्लास प्रारम्भ होकर खत्म भी हो गया पर अनुभव उसके खुले केश ही निहारता रह गया । वह भीतर ही भीतर साहस जुटाने की कोशिश करता । जब सभी उठकर जाने लगे तो चुपके से अनुभव ने कागज़ का एक टुकड़ा उसके हाथ में पकड़ा दिया । वह उस कागज़ को अपने दुपट्टे की ओट में छुपकर नज़रे झुका पढ़ने लगी । उसमें लिखा था -
"मैं तुम से बहुत प्रेम करता हूँ, क्या तुम भी मुझसे उतना ही प्रेम करती हो । यदि, हाँ तो काॅलेज के गार्डन में संध्या तीन बजे मुझसे मिलना …
तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा
अनुभव रोशन "
नेहा ने घड़ी की ओर देखा अभी ढेड़ बजे थे । नेहा सोचने लगी कि यह बात रोमा को बताए या न बताए । बहुत विचार करने के उपरांत उसने निर्णय लिया कि मेरे और अनुभव के बीच रोमा का क्या काम । नेहा ढ़ाई बजे ही गार्डन में जाकर बैठ गई और अनुभव से अपने हाले दिल सुनाने की तैयारी करने लगी । जैसे परीक्षा के समय परीक्षार्थी अपना पूरा ध्यान पेपर पर लगाए रखता है ठीक, नेहा की भी यही दशा थी । ठीक तीन बजे अनुभव गार्डन में आया । नेहा को वहाँ बैठा देख खुशी से भर उठा । दोनों कभी नज़रे मिलाते कभी नज़रे झुकाते । फिर नेहा ने उसका हाथ कस के पकड़ लिया । नेहा का हाथ अपने हाथ में देख अनुभव प्रेम उदबोधन से भर गया । उसने अपनी सारी मन की बात एक ही सांस में कह डाली और नेहा को अपने आलिंगन-पाश में जकड़ लिया । नेहा उसका आलिंगन पाकर तृप्ति के सागर में डूब गई । उसके प्रेम भरी पाती पर उसका प्रेमी अपने नाम का हस्ताक्षर कर दिया था । प्रेमी का हस्ताक्षर पाकर नेहा सौन्दर्य-बोध में नहाई अपने श्रृंगार में भास्वर दिखाई पड़ रही थी ।
Friday, September 17, 2021
राम भगवा नहीं भगवान हैं
शबरी के नहीं हैं राम
ना अहिल्या के हैं राम
निषादराज केवट
के भी नहीं है राम
राम तो राजा थें-अवध नरेश
सूरपति विष्णु के अवतार
जिसे हम सत्यनारायण भी कहते हैं
राम तो मर्यादाओं की सीमा रेखा हैं
वह भगवा नहीं भगवान हैं
बाल्मीकि के रामायण हैं
यदि विग्रह कर के हम देखें
राम विग्रह अयण बनता है
अयण जिसका अर्थ यात्रा है
रामायण अथार्त राम की यात्रा
यह राम कोई देश-प्रांत या घाटी का नाम नहीं है
यह राम ना तो हिन्दू है
ना मुसलमान
ना सिक्ख
ना ईसाई
राम ना तो मन्दिर में हैं ना मठों में
ना संप्रदाय में हैं ना पंथ में
राम की यात्रा अनंत है-अनवरत है
राम ना सन्यास में हैं ना त्याग में
ना हीं ब्राह्मण की पोथी में हैं
और ना हीं क्षत्रिय के अहंकार में हैं
ना ढोंग में हैं ना आडम्बर में हैं
ना किसी राजनीतिक दल से हैं
ना किसी पार्टी से सासंद है ना विधायक
ना मुखिया ना पंच
ना पार्षद ना वार्ड सदस्य
ना राष्ट्राध्यक्ष ना अम्बेस्डर
राम तो निषादराज केवट के काठ की नाव में हैं
राम तो शबरी के जूठे बेर में हैं
विदुर की बासी साग और रोटी में हैं
पाञ्चाली की हाण्डी के एक दाने में हैं
राम तो अच्युत हैं
राम नाम का व्यापार करने वाला व्यापारी
राम को खड़े बाजार में बेच सकता है
पर, राम नहीं हो सकता ।
~ अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'
05 सितंबर 2021
Tuesday, September 14, 2021
मैं हिन्दी का खड़ी पाई हूँ
मैं हिन्दी भाषा में
हिन्दी का खड़ी पाई हूँ ।
जैसे रात के अंधेरे में
रात्रि प्रहरी रात भर पहरा देता है
ठीक, मैं भी हिन्दी के पीछे खड़ा
हिन्दी की पहरेदारी करता हूँ
मैं जब भी हिन्दी में होता हूँ
तो, एक पूरे वाक्य के अंत में होता हूँ
(या कहें कि रख दिया जाता हूँ !)
पर जब भी होता हूँ
तो जीवन की एक-एक विशृंखलता को
गुम्फित कर
हिन्दी को एक सही अर्थ देता हूँ ।
इस तरह मेरा हिन्दी में खड़ी पाई होना
मुझे हिन्दी-सर्जक बना देता है
जो मेरे लिए हिन्दी का
मुझ पर किया गया
सबसे अनमोल कृत है ।
अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'
डेहरी-ऑन-सोन,रोहतास,बिहार ।
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