मन का बिंब है आस्था
आस्था वह पूंजी है । जिससे मन का विश्वास खरीदा जा सकता है । कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थिति सामने आकर खड़ी हो जाती है कि, आस्था का अंकुर मन में फूट पड़ता है । आस्था विजय है । आस्था वह शंखनाद है जो युद्ध भूमि में हमें विजय श्री का स्वाद चखाती है । आस्था जीवन की भौतिक यात्रा ही नहीं है बल्कि अध्यात्मिक यात्रा भी है । आस्था हमारी आत्मा की शक्ति है । आस्था का एक दार्शनिक अर्थ यह है कि, जब हम अपनी बुद्धि और विचार से कमज़ोर, असहाय पड़ने लगते हैं, तब एक अज्ञात आंतरिक शक्ति से मन-ही-मन त्राण की गुहार लगाने लगते हैं । तब, वह अज्ञात शक्ति हमारे भीतर एक ऐसा बल प्रदान करती है कि हम उस अज्ञात बल का आलंबन पाकर निश्चिंत होकर तूफानों में नौका पार कर जाते हैं । उस अज्ञात शक्ति का तेज़ बहाव हमें हमारी समस्याओं के समाधान के निकट पहुंचा देती है और हम अपनी समस्याओं के बीच से बड़ी ही सरलता से समस्याओं के बाहर निकल जाते हैं । यह अज्ञात आंतरिक शक्ति ही आस्था कहलाती है ।
मेरे कहने का यह अर्थ नहीं है की आस्था का एकमात्र अर्थ ईश्वर है । आप इसे ईश्वर से जोड़कर देखें या समझे । आस्था का प्रतीक बिंब ब्रह्मांड की ऊर्जा और दिव्य चेतना का प्रतीक माना जाता है । ब्रह्मांड की चार-दिवारी में कैद हमारा जीवन, यदि चाहे ब्रह्मांड की अभेद दीवार तोड़कर बाहर निकलना तो निकल नहीं सकता । यदि कोई निकल सका है तो वह आस्थावान व्यक्ति है । फिर भी वह ब्रह्मांड की नियत परिधि के भीतर ही रहा है । हां! भीतर रहकर अपनी कीर्ति को अवश्य ही ब्रह्मांड में स्थापित कर स्वयं को लोहा (अद्वितीय) सिद्ध किया है । वह कीर्तिमान व्यक्ति आम जीवन के लिए एक उदाहरण बना है । राक्षस राज हिरण कश्यप का पुत्र राक्षस कुमार प्रह्लाद अपनी आस्था के कारण ही आधुनिक युग में आज भी जीवित है तथा प्रत्येक वर्ष हम उसे होलिका दहन के रूप में याद करते हैं । आस्था परीक्षा की धधकती अग्नि से होकर गुजरती है, तभी फलित भी होती है । आस्था में ईश्वर (ब्रह्मांड की ऊर्जा) कर्ता हो जाता है, और सब कुछ कर्ता बनकर वह स्वयं करता है । क्योंकि; आस्था का अर्थ ही अमूर्त भाव से मूर्त भाव की ओर गमन करना है । जिसे हम अपनी इंद्रियों से अनुभव करते हैं । यह अनुभव हमें मरण शय्या से उठाकर तूफानों से लड़ने की शक्ति देता है । हम अपनी विफलताओं से थक-हार कर किसी मंदिर में जाते हैं । मंदिर में बैठे देवता से हम अपना सारा दुखड़ा कह सुनाते हैं । देवता कौन है ? ब्रह्मांड का चेतन ऊर्जा ही देवता है ।
एक समय की बात है कि एक दंपति को बड़े इंतज़ार, मिन्नतों और कष्टो के बाद संतान की प्राप्ति होती है । दंपति अर्थाभाव में अपना जीवन यापन कर रहा था । संतान प्राप्ति के तुरंत बाद डॉक्टरों की सलाह पर उस दंपति को बड़े अस्पताल में अपने पुत्र को भर्ती करना पड़ा । बड़े अस्पताल के बड़े-बड़े डॉक्टर का कहना था कि तुम्हारा बेटा बड़ा ही क्रिटिकल कंडीशन में है उसे वेंटिलेशन पर रखना होगा । चिकित्सीय जाल ऐसा सामने आ खड़ा हुआ कि वह दंपति क्या करता । नवजात का इलाज शुरू हो गया । शिशु को वेंटिलेशन पर लेटा दिया गया । चिकित्सा कर्मी कहने लगे जो वेंटिलेशन पर चला गया, उसकी जीवन की आशा मात्र दो प्रतिशत ही बचाती है । डॉक्टर की टीम तथा चिकित्सा कर्मी महंगे-महंगे दवाई, रक्त चढ़कर सब देख लिए मगर शिशु में कोई सुधार नहीं आया । अस्पताल प्रशासन ने रिसर्चर की टीम अलग-अलग प्रांतों से भी बुलाकर शिशु का इलाज करवाया । पर, कोई सुधार नहीं हुआ । समस्त जांच तथा उपाय निरुत्तर सिद्ध हुए । उधर दंपति कर्ज और दुख की बोझ तले दबता चला जा रहा था । देखते-देखते चालीस दिन गुजर चुके थें । लोग कहने लगे थें अब बच्चे में पैसा लगाना बेकार है; फ़िज़ूल है । मगर दंपति अपने पितृ धर्म को त्यागने या छोड़ने का साहस नहीं जुटा पा रहा था । डॉक्टर अपने हाथ ऊपर खड़े कर चुके थें । उनका कहना था कि अब जो करेंगे भगवान करेंगे । हमारे हाथ (मेडिकल साइंस) जितने ऊपर जा सकते थें, हम ले गए । डॉक्टरों का इशारा मेडिकल साइंस की ओर था मेडिकल साइंस मिरेकल को नहीं मानता है, लेकिन डॉक्टरों ने भी कहा कि अब इस बच्चे को कोई मिरेकल ही बचा सकता है ।
अब बात आती है कि यह मिरेकल आता कहां से है ? इसका स्रोत क्या है ? यह अपनी ऊर्जा कहां से ग्रहण करता है ? इन सारे सवालों का एक ही जवाब है कि यह मिरेकल आस्था से आती है । जिस प्रकार नमक पानी में घुलकर पानी को एक स्वाद प्रदान करता है । ठीक उसी प्रकार अपने भीतर की समस्त ऊर्जा (मैं) को ब्रह्मांड की ऊर्जा के हवन कुंड में ‘मैं’ का होम करने का नाम ही आस्था है । संज्ञा जब तक सर्वनाम नहीं बनता । आस्था का फलित रूप हमें देखने को नहीं मिलता, और यह फलित रूप ही मिरेकल है । यम से जो स्त्री अपने पति का प्राण वापस ले आई, यह कोई मिरेकल नहीं था । बल्कि स्त्री का पति धर्म के प्रति आस्था थी । आस्था निर्जीव को भी सजीव रूप प्रदान कर देती है । आस्था ‘मैं’ का क्षरण होने की एक क्रिया है । ‘मैं’ का जहां अभाव दिखाई पड़ता है वह स्थान ही आस्था है ।
आस्था के दो स्वरूप हैं सकारात्मक आस्था तथा नकारात्मक आस्था । सकारात्मक आस्था का आधार ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ है, तो नकारात्मक आस्था का आधार ‘डर, चिंता या आत्म-संशय’ है । नकारात्मक आस्था अवसरों पर प्रश्न चिन्ह लगाती है । वहीं सकारात्मक आस्था अवसरों में अपनी राह बनती है । सकारात्मक आस्था का दृष्टिकोण आशावादी, समाधान-उन्मुख है जबकि नकारात्मक आस्था का दृष्टिकोण नैराश्य, कुंठा है । हमारे भीतर की गतिज ऊर्जा कैसी है । यह गतिज ऊर्जा जैसी होगी हम कार्य भी वैसे ही करते हैं । दैवीय प्रवृत्ति (सकारात्मक आस्था) होने पर हम ब्रह्मांड की सहायक शक्ति बनकर कार्य करते हैं, और आसुरी प्रवृत्ति (नकारात्मक आस्था) होने पर हम ब्रह्मांड की विरोधी शक्ति बनकर कार्य करते हैं । एक उदाहरण से हम समझ सकते हैं । “मैं यह कार्य कर सकता हूं । यह मेरे द्वारा ही किया जा सकता है ।” नकारात्मक आस्था कहती है । “मैं यह कार्य कैसे कर सकता हूं ? मैंने तो कभी किया ही नहीं है । यह तो फलाने का कार्य है । मैं जब सीख लूंगा, तब यह करने की कोशिश करूंगा । मुझसे अभी यह नहीं होगा ।”
यह तय हमें करना है कि हमें कैसी आस्था मन में जगानी है ? हमारे मन का प्रतीक बिंब हमें हमारे जीवन को ऊर्जास्वित करें, ऐसी आस्था हमें मन में जगानी है । या ऐसी आस्था जो हमारे जीवन को नैराश्य की काल कोठरी में कूप मंडूक बनाकर एक ही स्थान पर भटकाती रहे । विकासोन्मुख ना बना पाए । जीवन में सब कुछ तय आस्था से होता है । जैसी हमारी आस्था, वैसे हमारे मनोरथ ।
अभिषेक कुमार अभ्यागत
न्यू एरिया, डेहरी ऑन-सोन
रोहतास, बिहार ।
10 मई 2026
