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Friday, September 17, 2021

राम भगवा नहीं भगवान हैं

शबरी के नहीं हैं राम
ना अहिल्या के हैं राम
निषादराज केवट 
के भी नहीं है राम
राम तो राजा थें-अवध नरेश
सूरपति विष्णु के अवतार
जिसे हम सत्यनारायण भी कहते हैं
राम तो मर्यादाओं की सीमा रेखा हैं
वह भगवा नहीं भगवान हैं
बाल्मीकि के रामायण हैं
यदि विग्रह कर के हम देखें
राम विग्रह अयण बनता है
अयण जिसका अर्थ यात्रा है
रामायण अथार्त राम की यात्रा


यह राम कोई देश-प्रांत या घाटी का नाम नहीं है
यह राम ना तो हिन्दू है
ना मुसलमान
ना सिक्ख
 ना ईसाई
राम ना तो मन्दिर में हैं ना मठों में
ना संप्रदाय में हैं ना पंथ में
राम की यात्रा अनंत है-अनवरत है
राम ना सन्यास में हैं ना त्याग में
ना हीं ब्राह्मण की पोथी में हैं
और ना हीं क्षत्रिय के अहंकार में हैं
ना ढोंग में हैं ना आडम्बर में हैं
ना किसी राजनीतिक दल से हैं
ना किसी पार्टी से सासंद है ना विधायक 
ना मुखिया ना पंच
ना पार्षद ना वार्ड सदस्य 
ना राष्ट्राध्यक्ष ना अम्बेस्डर 


राम तो निषादराज केवट के काठ की नाव में हैं
राम तो शबरी के जूठे बेर में हैं
विदुर की बासी साग और रोटी में हैं
पाञ्चाली की हाण्डी के एक दाने में हैं
राम तो अच्युत हैं
राम नाम का व्यापार करने वाला व्यापारी 
राम को खड़े बाजार में बेच सकता है
पर, राम नहीं हो सकता ।


~ अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'
      05 सितंबर 2021

Tuesday, September 14, 2021

मैं हिन्दी का खड़ी पाई हूँ


मैं हिन्दी भाषा में 
हिन्दी का खड़ी पाई हूँ ।

जैसे रात के अंधेरे में
रात्रि प्रहरी रात भर पहरा देता है 
ठीक, मैं भी हिन्दी के पीछे खड़ा 
हिन्दी की पहरेदारी करता हूँ 
मैं जब भी हिन्दी में होता हूँ 
तो, एक पूरे वाक्य के अंत में होता हूँ 
(या कहें कि रख दिया जाता हूँ !)
पर जब भी होता हूँ 
तो जीवन की एक-एक विशृंखलता को 
गुम्फित कर
हिन्दी को एक सही अर्थ देता हूँ ।

इस तरह मेरा हिन्दी में खड़ी पाई होना
मुझे हिन्दी-सर्जक बना देता है 
जो मेरे लिए हिन्दी का 
मुझ पर किया गया 
सबसे अनमोल कृत है  ।

अभिषेक कुमार 'अभ्यागत' 
डेहरी-ऑन-सोन,रोहतास,बिहार  ।