पत्रकारिता के उच्च आदर्शों की दृष्टि से देखा जाए तो साहित्य ही पत्रकारिता को दिशा प्रदान करता है। साहित्य को पढ़े और समझे बिना किसी पत्रकार की पत्रकारिता पूर्ण नहीं हो सकती। साहित्य के प्रति रुचि पत्रकार और उसकी पत्रकारिता, दोनों को अधिक संवेदनशील, विचारशील तथा मुखर बनाती है।
ऐसे ही मेरे बचपन के एक मित्र हैं—बेताब अहमद ‘बेताब’, जिनकी पहचान नगर के एक प्रबुद्ध पत्रकार के रूप में है। वे मुंशीफ टीवी सैटेलाइट उर्दू न्यूज़ चैनल, सहारा एक्सप्रेस उर्दू दैनिक समाचार-पत्र तथा नव बिहार दुत हिंदी दैनिक समाचार-पत्र में रोहतास के ब्यूरो प्रमुख के रूप में प्रतिष्ठित हैं। एक सफल पत्रकार होने के साथ-साथ वे एक सशक्त ग़ज़लकार भी हैं।
उनसे मेरा साहित्यिक जुड़ाव लगभग दो दशकों पुराना है। हम दोनों ने कुछ कवि-गोष्ठियों में साथ-साथ कविता एवं ग़ज़ल-पाठ किया है। मेरी रचनाओं पर वे समय-समय पर अपनी प्रतिक्रियाएँ, विचार और सुझाव साझा करते रहे हैं।
गत रविवार, पत्रकारिता की व्यस्तताओं के बीच से समय निकालकर वे मुझसे मिलने आए। लगभग दो से तीन घंटे तक हमारे बीच पत्रकारिता के बदलते मूल्य, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की जनता के बीच घटती विश्वसनीयता तथा समकालीन पत्रकारिता की चुनौतियों पर गंभीर चर्चा हुई। इसके साथ ही साहित्य के विविध आयामों, मेरे नाटक-संग्रह ‘किसके सहारे’ तथा विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को लेकर भी विस्तृत संवाद हुआ।
विदा होने से पूर्व मैंने उन्हें अपनी पुस्तक ‘किसके सहारे’ तथा उत्तराखंड से पलाश विश्वास द्वारा संपादित साहित्यिक पत्रिका ‘प्रेरणा अंशु’ की एक प्रति भेंट की, जिसमें मेरी कविता ‘पहाड़ी आदिवासी के गीत’ प्रकाशित है।
मेरा मानना है कि किसी पुस्तक का सही मूल्यांकन तभी संभव है, जब वह एक सच्चे और संवेदनशील पाठक के हाथों तक पहुँचे। और जब वह पाठक एक प्रबुद्ध पत्रकार भी हो, तब यह विश्वास और प्रबल हो जाता है कि पुस्तक के साथ न्यायपूर्ण समीक्षा और सार्थक मूल्यांकन अवश्य होगा ।
अभिषेक कुमार अभ्यागत
न्यू एरिया (काली मंदिर गली)
डेहरी ऑन-सोन, रोहतास, बिहार ।