भाषा चेतना की सहज अभिव्यक्ति है, जिसे साहित्य द्वारा समझा ही नहीं जा सकता है; बल्कि भाषा-साहित्य द्वारा समाज को एक उन्नयन दिशा की ओर प्रशस्त भी किया जा सकता है ।
Tuesday, July 28, 2026
पत्रकार पत्रकारिता और साहित्य
Monday, May 25, 2026
मन का बिंब है आस्था
मन का बिंब है आस्था
आस्था वह पूंजी है । जिससे मन का विश्वास खरीदा जा सकता है । कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थिति सामने आकर खड़ी हो जाती है कि, आस्था का अंकुर मन में फूट पड़ता है । आस्था विजय है । आस्था वह शंखनाद है जो युद्ध भूमि में हमें विजय श्री का स्वाद चखाती है । आस्था जीवन की भौतिक यात्रा ही नहीं है बल्कि अध्यात्मिक यात्रा भी है । आस्था हमारी आत्मा की शक्ति है । आस्था का एक दार्शनिक अर्थ यह है कि, जब हम अपनी बुद्धि और विचार से कमज़ोर, असहाय पड़ने लगते हैं, तब एक अज्ञात आंतरिक शक्ति से मन-ही-मन त्राण की गुहार लगाने लगते हैं । तब, वह अज्ञात शक्ति हमारे भीतर एक ऐसा बल प्रदान करती है कि हम उस अज्ञात बल का आलंबन पाकर निश्चिंत होकर तूफानों में नौका पार कर जाते हैं । उस अज्ञात शक्ति का तेज़ बहाव हमें हमारी समस्याओं के समाधान के निकट पहुंचा देती है और हम अपनी समस्याओं के बीच से बड़ी ही सरलता से समस्याओं के बाहर निकल जाते हैं । यह अज्ञात आंतरिक शक्ति ही आस्था कहलाती है ।
मेरे कहने का यह अर्थ नहीं है की आस्था का एकमात्र अर्थ ईश्वर है । आप इसे ईश्वर से जोड़कर देखें या समझे । आस्था का प्रतीक बिंब ब्रह्मांड की ऊर्जा और दिव्य चेतना का प्रतीक माना जाता है । ब्रह्मांड की चार-दिवारी में कैद हमारा जीवन, यदि चाहे ब्रह्मांड की अभेद दीवार तोड़कर बाहर निकलना तो निकल नहीं सकता । यदि कोई निकल सका है तो वह आस्थावान व्यक्ति है । फिर भी वह ब्रह्मांड की नियत परिधि के भीतर ही रहा है । हां! भीतर रहकर अपनी कीर्ति को अवश्य ही ब्रह्मांड में स्थापित कर स्वयं को लोहा (अद्वितीय) सिद्ध किया है । वह कीर्तिमान व्यक्ति आम जीवन के लिए एक उदाहरण बना है । राक्षस राज हिरण कश्यप का पुत्र राक्षस कुमार प्रह्लाद अपनी आस्था के कारण ही आधुनिक युग में आज भी जीवित है तथा प्रत्येक वर्ष हम उसे होलिका दहन के रूप में याद करते हैं । आस्था परीक्षा की धधकती अग्नि से होकर गुजरती है, तभी फलित भी होती है । आस्था में ईश्वर (ब्रह्मांड की ऊर्जा) कर्ता हो जाता है, और सब कुछ कर्ता बनकर वह स्वयं करता है । क्योंकि; आस्था का अर्थ ही अमूर्त भाव से मूर्त भाव की ओर गमन करना है । जिसे हम अपनी इंद्रियों से अनुभव करते हैं । यह अनुभव हमें मरण शय्या से उठाकर तूफानों से लड़ने की शक्ति देता है । हम अपनी विफलताओं से थक-हार कर किसी मंदिर में जाते हैं । मंदिर में बैठे देवता से हम अपना सारा दुखड़ा कह सुनाते हैं । देवता कौन है ? ब्रह्मांड का चेतन ऊर्जा ही देवता है ।
एक समय की बात है कि एक दंपति को बड़े इंतज़ार, मिन्नतों और कष्टो के बाद संतान की प्राप्ति होती है । दंपति अर्थाभाव में अपना जीवन यापन कर रहा था । संतान प्राप्ति के तुरंत बाद डॉक्टरों की सलाह पर उस दंपति को बड़े अस्पताल में अपने पुत्र को भर्ती करना पड़ा । बड़े अस्पताल के बड़े-बड़े डॉक्टर का कहना था कि तुम्हारा बेटा बड़ा ही क्रिटिकल कंडीशन में है उसे वेंटिलेशन पर रखना होगा । चिकित्सीय जाल ऐसा सामने आ खड़ा हुआ कि वह दंपति क्या करता । नवजात का इलाज शुरू हो गया । शिशु को वेंटिलेशन पर लेटा दिया गया । चिकित्सा कर्मी कहने लगे जो वेंटिलेशन पर चला गया, उसकी जीवन की आशा मात्र दो प्रतिशत ही बचाती है । डॉक्टर की टीम तथा चिकित्सा कर्मी महंगे-महंगे दवाई, रक्त चढ़कर सब देख लिए मगर शिशु में कोई सुधार नहीं आया । अस्पताल प्रशासन ने रिसर्चर की टीम अलग-अलग प्रांतों से भी बुलाकर शिशु का इलाज करवाया । पर, कोई सुधार नहीं हुआ । समस्त जांच तथा उपाय निरुत्तर सिद्ध हुए । उधर दंपति कर्ज और दुख की बोझ तले दबता चला जा रहा था । देखते-देखते चालीस दिन गुजर चुके थें । लोग कहने लगे थें अब बच्चे में पैसा लगाना बेकार है; फ़िज़ूल है । मगर दंपति अपने पितृ धर्म को त्यागने या छोड़ने का साहस नहीं जुटा पा रहा था । डॉक्टर अपने हाथ ऊपर खड़े कर चुके थें । उनका कहना था कि अब जो करेंगे भगवान करेंगे । हमारे हाथ (मेडिकल साइंस) जितने ऊपर जा सकते थें, हम ले गए । डॉक्टरों का इशारा मेडिकल साइंस की ओर था मेडिकल साइंस मिरेकल को नहीं मानता है, लेकिन डॉक्टरों ने भी कहा कि अब इस बच्चे को कोई मिरेकल ही बचा सकता है ।
अब बात आती है कि यह मिरेकल आता कहां से है ? इसका स्रोत क्या है ? यह अपनी ऊर्जा कहां से ग्रहण करता है ? इन सारे सवालों का एक ही जवाब है कि यह मिरेकल आस्था से आती है । जिस प्रकार नमक पानी में घुलकर पानी को एक स्वाद प्रदान करता है । ठीक उसी प्रकार अपने भीतर की समस्त ऊर्जा (मैं) को ब्रह्मांड की ऊर्जा के हवन कुंड में ‘मैं’ का होम करने का नाम ही आस्था है । संज्ञा जब तक सर्वनाम नहीं बनता । आस्था का फलित रूप हमें देखने को नहीं मिलता, और यह फलित रूप ही मिरेकल है । यम से जो स्त्री अपने पति का प्राण वापस ले आई, यह कोई मिरेकल नहीं था । बल्कि स्त्री का पति धर्म के प्रति आस्था थी । आस्था निर्जीव को भी सजीव रूप प्रदान कर देती है । आस्था ‘मैं’ का क्षरण होने की एक क्रिया है । ‘मैं’ का जहां अभाव दिखाई पड़ता है वह स्थान ही आस्था है ।
आस्था के दो स्वरूप हैं सकारात्मक आस्था तथा नकारात्मक आस्था । सकारात्मक आस्था का आधार ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ है, तो नकारात्मक आस्था का आधार ‘डर, चिंता या आत्म-संशय’ है । नकारात्मक आस्था अवसरों पर प्रश्न चिन्ह लगाती है । वहीं सकारात्मक आस्था अवसरों में अपनी राह बनती है । सकारात्मक आस्था का दृष्टिकोण आशावादी, समाधान-उन्मुख है जबकि नकारात्मक आस्था का दृष्टिकोण नैराश्य, कुंठा है । हमारे भीतर की गतिज ऊर्जा कैसी है । यह गतिज ऊर्जा जैसी होगी हम कार्य भी वैसे ही करते हैं । दैवीय प्रवृत्ति (सकारात्मक आस्था) होने पर हम ब्रह्मांड की सहायक शक्ति बनकर कार्य करते हैं, और आसुरी प्रवृत्ति (नकारात्मक आस्था) होने पर हम ब्रह्मांड की विरोधी शक्ति बनकर कार्य करते हैं । एक उदाहरण से हम समझ सकते हैं । “मैं यह कार्य कर सकता हूं । यह मेरे द्वारा ही किया जा सकता है ।” नकारात्मक आस्था कहती है । “मैं यह कार्य कैसे कर सकता हूं ? मैंने तो कभी किया ही नहीं है । यह तो फलाने का कार्य है । मैं जब सीख लूंगा, तब यह करने की कोशिश करूंगा । मुझसे अभी यह नहीं होगा ।”
यह तय हमें करना है कि हमें कैसी आस्था मन में जगानी है ? हमारे मन का प्रतीक बिंब हमें हमारे जीवन को ऊर्जास्वित करें, ऐसी आस्था हमें मन में जगानी है । या ऐसी आस्था जो हमारे जीवन को नैराश्य की काल कोठरी में कूप मंडूक बनाकर एक ही स्थान पर भटकाती रहे । विकासोन्मुख ना बना पाए । जीवन में सब कुछ तय आस्था से होता है । जैसी हमारी आस्था, वैसे हमारे मनोरथ ।
अभिषेक कुमार अभ्यागत
न्यू एरिया, डेहरी ऑन-सोन
रोहतास, बिहार ।
10 मई 2026
Friday, February 06, 2026
प्रो. राम अशीष की दो पुस्तकों ' कुछ अनुत्तरित प्रश्न' तथा ' किसी और को दोष क्यों दूँ' का लोकार्पण
Sunday, August 10, 2025
दोस्ती/ Dosti यह कविता हमेशा हमे दोस्तों की याद दिलाएगी
हवाओं सा उड गय,
कभी जो हमने साथ;
बिताए थे, दोस्तों के संग ।
वो मस्ती,
वो रंग,
वो उमंग,
आज वह हवाएं
मौन दिशा से उड़ कर,
उन दोस्तों की छवि गंध लिए;
मेरे चित्त को महकाने आयी है,
उनकी यादों की बरसात लिए,
उमड़ी है, मेरे अंतर्मन को भिगोने
और, मैं भीगकर मानों
अपनी दोस्ती का हाथ थामें,
अपने दोस्तों के साथ चलरहा हूँ ।
- अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'
'परिंदा खोजे बसेरा' भोजपुरी अतुकान्त कविता संग्रह का पुस्तक सम्मति : अभिषेक कुमार अभ्यागत
Wednesday, October 06, 2021
प्रेम भरी पाती
Friday, September 17, 2021
राम भगवा नहीं भगवान हैं
Tuesday, September 14, 2021
मैं हिन्दी का खड़ी पाई हूँ
Sunday, December 06, 2020
कवि अभ्यागत की दस कविताएं
शीर्षक : ले चलो नदी
ले चलो नदी!
मुझे अपनी धारा में
बहाकर उस सभ्यता की ओर
उस बस्ती में
जहाँ आदमी अपनी सामाजिकता
नैतिक सिद्धांत तथा आदर्श को
बोझ समझकर ढ़ोता ना हो
स्वार्थ की अग्नि
जहाँ निर्वैयक्तिकता को
जलाती ना हो
कहो नदी!
मुझे ले चलोगी
उस बस्ती में
मैं थक गया हूँ
इस बस्ती के लोगों से
उनके झूठ के
इस दिखावे से
हे नदी!
क्या तुम मुझे अपनी
इस कृपा का पात्र बनाओंगी ।
शीर्षक : सुनों सीता
सुनों सीता!
माना की तुम रामायण में
श्री राम की नायिका थी
पर, एक नायिका और भी थी
जिसे तुम्हारी कुटिल माया
और, श्री राम का पत्नी प्रेम ने
उस कान्ता नायिका को कभी भी
नेपथ्य से पर्दे पर
आने का अवसर नहीं दिया
वह जब भी आना चाही
किसी-ना-किसी शर्तों में फाँस
उसे लोगों के सामने आने से
रोकने की हर संभव कोशिश की गई
तुम्हें शायद भय था
कहीं मेरी प्रसिद्धि ना छीन ले
कहीं मेरी लोकप्रियता के
दो हिस्से ना कर दे
इसलिए, तो तुम पूरी रामायण
आँसू बहा लोगों की संवेदना-कोष
अपने पर खर्च करवाती रही
क्योंकि, आँसू किसी की संवेदना को
अधिग्रहित करने का
सबसे अच्छा मार्ग है
शायद यही वजह रही होगी
कि तुमने, उसे ना रोने का संकल्प
बड़ी हीं चातुर्य के साथ
उसके प्रियतम से दिलवा दी होगी ।
3. शीर्षक : सृष्टि
देख रही हो सृष्टि!
कैसे यह दीर्घ पेड़
अर्रा कर जमीन पर
गिरा पड़ा है
ठीक ऐसे हीं एक दिन
हम मानव भी
अर्रा कर गिर जाएँगे
साँसे टूट कर
छींटक जाएँगी हाथों से
जो कुछ भी है मुठ्ठी में आज
वह सब मिट्टी हो जाएँगी
बची रह जाओगी केवल तुम
फिर से, शिथिल जीवन को
देने को नूतन गति
तुम कल भी थी
तुम आज भी हो
और ना जाने तुम
कितने सालों से
इसी तरह हमारे शिथिल जीवन को
हजार-हजार बार गति देने को
कटिबद्ध जीते आ रही हो ।
4. शीर्षक : भूखे आदमी की नींद में
एक भूखे आदमी की नींद में
सहसा एक श्वेत घोड़ा
दौड़ने लग जाता है
और, वह दौड़ते-दौड़ते
एक किसान के खेत में
अचानक से घुस जाता है
हरे-भरे खेत और
लहलहाते बालियों की गंध
उसके खुरों से उड़ कर
उस आदमी की नींद तक
धीरे-धीरे पहुँचती है
और, आदमी नींद में कुलबुलाने लगता है
गेहूँ की गंध
बाजरे की गंध
मक्के की गंध
सरसों, अरहर, चना, चौराई आदि
और, ना जाने ऐसे कितने
गंध की मिठास
वह खींचने लग जाता है अपने भीतर
जैसे खाने के उपरांत
कोई प्लेट में रखी गर्म चाय
खींचता है अपने भीतर ।
5. शीर्षक : शहर में रात
इस शहर में रात
अक्सर देर से होती है
देर से लोग खाना खाते हैं
और, देर से निकल पड़ते हैं
सड़कों पर दुधिया रोशनी के बीच
खम्भों पर लटकती
सन्नाटे को धुएँ में उड़ाते
सिगरेट की आग को झारते हुए
एक लम्बी बहस की दिशा में
विषय कुछ भी हो सकता है
जब तक हाथों में सिगरेट है
बहस जारी रहती है
घरों की बत्ती बुझा दी जाती है
और, गली की आखिरी छोर पर
खड़ा नगरपालिका का
भकभकाता एकमात्र ट्यूब लाइट
जलता रहता है रात भर अकेले में
जब तक शहर में रात
नहीं हो जाती
रात होते हीं वह भी
भकभकाना बंद कर देता है
और शुरू हो जाता है रात भर
कुत्ते का भोंकना
झिंगुर की कीर-कीर
बहादुर की लाठी का ठक-ठक ।
6. शीर्षक : उदासी
जब तक यह उदासी
छाई रहेगी
छाया रहेगा एक अंधेरा
आकंठमग्न में डूबा
कीरी बनकर खाता रहेगा
भीतर का अन्न-जल भंडार
और, ना हीं फेंकने देगा
आशा की पचकियाँ हीं
जरा सोचों पथिक
फिर, कुटज कौन खिलाएँगा
फिर, कैसे उचाट ख़ालीपन में
उतरेगा वसंत
तुमने देखकर भी
नहीं देखा है कभी
उसर भूमि पर
शैवालों का पनप-ना
या, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण
के विपरीत, कब देखा है
नदी का बहना
निकलो पथिक इन लोककथाओं से
यह लोककथा की उदासी है
इसे लोककथाओं में हीं रहने दो
मत सजाओं तुम इसे
अपने मन की दीवारों पर ।
7. शीर्षक : बाल मजदूर
वह नन्हा-सा मजदूर
जिसे देखा था मैंने
'मुखिया जी' नाम का
एक भोजनालय पर
जूठे बर्त्तनों के बीच
कुछ गुमसुम-सा
आपना निरवत्व लिए हुए
निर्विकार बैठा किसी का जूठन
कर कमलों से मल रहा था
हाँ, हाँ, मल रहा था
कभी-कभी दृष्टि को उठा
अपना बचपन हाँ-हाँ अपना बचपन
आते-जाते हर पथिक में
ढूँढ रहा था-ढूँढ रहा था
और थक-हार कर पुनः
राख लगी अपनी हथेली देखने लगता
मानों अपना भाग्य पढ़ रहा हो
और, बुदबुदाते हुए मन में
ईश्वर को बार-बार कोसता
तो, कभी अपनी विवशता पर
खुद ही झल्ला उठता था
वह विशुद्ध मजदूर
जिसका अपना कोई नाम नहीं था
वह समाज का जूठन उठाए
'बाल मजदूर' कहलाता फिरता था ।
8. शीर्षक : मैं लौटा हूँ
मैं लौटा हूँ
अभी-अभी
बुद्ध की अकड़ी देह
सीधी कर के ।
मैं लौटा हूँ
अभी-अभी
कपिलवस्तुऔर श्रावस्ती से
वहाँ एक भी
बुद्ध का प्रतिक या स्मृति चिह्न
मुझे नहीं मिला देखने को
और, ना हीं बुद्ध को
वहाँ कोई जानता है ।
मैं लौटा हूँ
अभी-अभी
बुद्ध का ज्ञान
किसी नदी-नाले में
विसर्जित होता हुआ देख ।
मैं लौटा हूँ
अभी-अभी
अपने पीठ पर
बुद्ध का दुःख लादे हुए ।
9 . शीर्षक : एक दलित लड़की का प्रश्न
वह चुप थी
मैं भी चुप खड़ा
उसी की ओर देख रहा था ।
वह सहसा किसी प्रश्न की भाँति
एक पूरे वाक्य सहित हिली
और, फिर अचानक से
एकदम शांत हो गई ।
पर वाक्य अब भी
हिल रहे थे
प्रश्न अब भी
वाक्य के अंत में
एक प्रश्न बना हुआ था ।
यह प्रश्न उस दलित लड़की का था
जो, एक दूध मुँहे बालक
नन्नूहा की माँ भी थी
और, नन्नूहा की बड़ी बहन भी
पर, प्रश्न तो यह है
कि, नन्नूहा का पिता कौन है ?
वह सामने क्यूँ नहीं आता ?
और, नन्नूहा की माँ की हत्या
आखिर, में किसने की ?
10 . शीर्षक : बनारस
पूछता है
मणिकर्णिका घाट
का पानी
पूछती है
दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियाँ
पूछता है काशी का शंखनाद
पूछती है
बाबा विश्वनाथ मंदिर की
ऊँची-ऊँची स्वर्ण गुम्बदें ।
घण्टों की टन-टन
संध्या-आरती का धूप-दीप
असंख्य मोक्ष प्राप्त आत्माएँ
सकरी-आड़ी-तिरछी
बनारस की गलियों से
उसकी, ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं से
कबीर क्यूँ कूच कर गए ?
अपनी फकीरी का झोला उठाए
मोक्षदायिनी नगरी बनारस से
और जा बसे
किंवदंतियों की नगरी
मगहर में ।
बनारस हाँ-हाँ बनारस
शिव की नगरी बनारस
कवि केदारनाथ सिंह की कविता वाला
एक टाँग पर खड़ा बनारस ।

